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VOL. 4, ISSUE 3 (2019)
मनुस्मृति में राजनैतिक शिक्षण
Authors
डाॅ0 विनी शर्मा
Abstract
धर्मशास्त्र को धर्मसूत्र के एक रूप में माना गया है तथा इसके अन्तर्गत सभी कानून, साहित्य, राजशास्त्र को समाहित किया गया है। धर्मसूत्रों का विकास विभिन्न स्मृतियों में हुआ जिसका स्रोत विभिन्न श्लोकों में मिलता है। प्राचीनतम स्मृतियों में मनुस्मृति का उल्लेख अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा है। मनु भारत के प्रथम प्रमुख राजशास्त्री एवं विधि संहिताकार है। उन्होंने अपनी मनुस्मृति में राजतंत्र के प्रजापालक स्वरूप पर बल दिया और राज्य को प्रजा हितकारी संस्था के रूप में मान्यता दी। राजनीतिक, आर्थिक एवं न्यायिक प्रशासन के विभिन्न पक्षों को भलीभांति उल्लेख किया है। मनु ने कानून अर्थात् विधि-विधान के चार स्रोतों की चर्चा की है - प्रथम शाश्वत कानून सार्वजनिक है, वेद साहित्य इसका स्रोत है, द्वितीय स्मृति पर बना कानून श्रुतियों पर आधारित कानून होता है, तृतीय कानून आचरण पर आधारित कानून है जो अपने स्वरूप में नैतिक होता है तथा चतुर्थ प्रकार मनु द्वारा निर्मित कानून है अर्थात् वह कानून जो आत्म अर्थात् अन्तःकरण के अनुरूप होता है। मनु ने धर्म को समस्त कानूनों का स्रोत बताया है। मनु ने मानव जीवन को उन्नत प्रगतिशील और राष्ट्र-रक्षा, राजधर्म और मानव धर्म के मापदण्डों के द्वारा राष्ट्र को सबल और सुव्यवस्थित बनाने का राजनैतिक शिक्षण प्रदान किया है। मनु ने राजधर्म का सर्वोत्कृष्ट शिक्षण मनुस्मृति में उल्लेख किया है। राजधर्म में सभी के हितों का विशेष तौर पर ध्यान रखा गया है।
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Pages:30-33
How to cite this article:
डाॅ0 विनी शर्मा "मनुस्मृति में राजनैतिक शिक्षण". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 4, Issue 3, 2019, Pages 30-33
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