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VOL. 3, ISSUE 5 (2018)
स्त्री जीवन की त्रासदी और मृदुला गर्ग के उपन्यास का अध्ययन
Authors
मीनू साकेत
Abstract
आज सारी दुनियाँ में स्त्रीवादी चिन्तन, लेखन और स्त्रीमुक्ति के आन्दोलनों के माध्यम से स्त्रियाँ अपने बारे में सजग और सचेत हुई हैं। स्त्रीवादी चिन्तन ने मानव समाज और संस्कृति के इतिहास में स्त्रियों की बदलती हुई स्थिति और भूमिका का गंभीर विवेचन करते हुए आज के युग में स्त्री की बदलती हुई स्थिति समझने-समझाने में काफी मदद की है। आज स्त्रियाँ पुरानी रूढ़ियों और तरह-तरह के अत्याचारों से मुक्ति अपने अधिकारों की रक्षा और व्यापक रूप में स्त्री समुदाय की स्वतंत्रता की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। इन सबका असर स्त्री-लेखन पर पड़ा है। नवीन युग की भारतीय स्त्री भी इस भार का अनुभव कर रही है, जो बाहर से हर क्षण को भरकर भीतर की हर साँस को खाली कर देता है। स्वतंत्रता सबके लिए जीने की शक्ति न दे सके तो मनुष्य के लिए प्रसाधन मात्र रह जाएगी और सबके लिए जीने की विद्युत सहानुभूति के जल में उत्पन्न होती है। आधुनिक युग, परतंत्रों और पीड़ितों के उत्थान का युग रहा है और उनके उत्थान से मानव-समाज के सभी क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। यह निर्विवाद तथ्य सत्य है कि भारत पुरुष प्रधान देश रहा है और युगों-युगों से स्त्री पराधीनता की जो परम्परा चली आई है, उसके कारण स्त्रियों का जीवन कठिन और अवसादपूर्ण होता गया है। साहित्य की विभिन्न विधाओं में भाँति-भाँति से स्त्री के आर्तनाद, विषाद और पीड़ा को उजागर किया गया है।
मृदुला गर्ग ने अपने कथा साहित्य में यह स्पष्ट किया है कि आज के परिवेश में स्त्री भी सामाजिक चेतना से पूर्ण हो रही है। अपनी सामाजिक भूमिका में पुरुषों से बराबरी का अधिकार माँग रही है और इस दिशा में वह संघर्षशील भी है। सामाजिक कुरीतियों का सबसे ज्यादा शिकार स्त्री वर्ग हो रहा है। उसमें समाजवादी चेतना आयी है, परन्तु सदियों से चली आ रही निरक्षरता के कारण वह इस दिशा में ही प्रयत्नशील हो पाती हैं। कहानियों में सामाजिक मूल्यों की सही लड़ाई का समर्थन किया गया है। ये कहानियाँ स्त्री के लिए समाज द्वारा निर्मित नैतिक मूल्य-व्यवस्था के छद्म को गहराई से महसूस कराती हैं। अधिकांश कहानियाँ स्त्री के पक्ष में ये दर्शाती हैं कि सभ्यता के विकास के प्रत्येक चरण में ‘नैतिक-अनैतिक’ के प्रश्न स्त्री को बार-बार अग्नि-परीक्षा के लिए खड़ा करते रहे हैं। ये कहानियाँ रूढ़ परम्पराओं, तत्वों और यथास्थिति वादियों को बेनकाब करती हैं।
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Pages:68-73
How to cite this article:
मीनू साकेत "स्त्री जीवन की त्रासदी और मृदुला गर्ग के उपन्यास का अध्ययन". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 3, Issue 5, 2018, Pages 68-73
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