ARCHIVES
VOL. 2, ISSUE 5 (2017)
संगीत: धर्म के पूरक के रूप में
Authors
डाॅ0 ऋचा
Abstract
संगीत ललित कलाओं में सर्वोत्तम है। यह एक ऐसी अमूर्त सौंदर्य की प्रतिष्ठा कराती है, जिसका प्रभाव विश्वव्यापी है। नाद ब्रह्म स्वरूप है। सृष्टि का आरम्भ अनाहत नाद से माना जाता है, जो ब्रहमांड व्यापी है। संगीत एक ऐसी दिव्य एवं अलौकिक शक्ति है, जिसके द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। संगीत आनंद की अनुभूति है एवं धर्म सत्य की उपलब्धि है। संगीत के अलावा ऐसी कोई भी कला नहीं है जो हमें ईश्वर के निकटतम ले जाए। धर्म चाहे कोई भी हो, ईश उपासना प्रत्येक धर्म का लक्ष्य है। प्रत्येक धर्म में मंत्रों, वाणियों, हदिसों, प्रवचनों, स्तुतियों में संगीत को स्थान मिला है। सभी धर्मो तथा सन्त महापुरुषों ने संगीत को परम पवित्र, कल्याणकारी तथा ईश्वर प्राप्ति का मुख्य साधन माना है। वैदिक काल में जहाँ संगीत को मोक्ष प्राप्ति का साधन माना जाता था, वहीं दूसरी और जनरंजन करना भी इसका उद्देश्य था। संगीत अपनी आध्यात्मिकता सहित आज भी मानव को शांति प्रदान करता है।
Download
Pages:829-831
How to cite this article:
डाॅ0 ऋचा "संगीत: धर्म के पूरक के रूप में". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 2, Issue 5, 2017, Pages 829-831
Pdf, Certificate, Cover Page, Index Page, Editorial Page, Accept Letter
Please enter the email address corresponding to this article submission.
