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VOL. 2, ISSUE 3 (2017)
छन्द : समीक्षा में प्रतिपादित छन्दोगणित की प्रासंगिकता
Authors
रवि कुमार मीना
Abstract
संस्कृत साहित्य का सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ वेद है। वेद के छः (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द) अङ्गों में एक छन्दःशास्त्र जिसे वेदों का पाद कहा गया है। वेद के गूढ अर्थ को जानने के लिये छः वेदाङ्गों में छन्द का अन्यतम स्थान है। छन्दः शास्त्र की आचार्य परम्परा में पिङ्गल, भरत, केदारभट्ट, हेमचन्द्र, गङ्गादास आदि के ग्रन्थों की महत्ता सुज्ञात है। छन्दःसमीक्षा के अन्तर्गत छन्दःशिक्षा, छन्दोगणित, छन्दोनिरुक्ति, छन्दोव्याकरण और छन्दःकल्प आदि प्रमुख विषयों का विवेचन किया गया है। आधुनिक विद्वान् पण्डित मधुसूधन ओझा ने उक्त विषयों की समीक्षा अपने ग्रन्थ छन्दःसमीक्षा में की है। उक्त ग्रन्थ का द्वितीय अंग छन्दोगणित है जिसमें प्रस्तार, नष्ट इत्यादि प्रत्ययों को विस्तार से बताया गया है। इस शोधपत्र का मुख्य उद्देश्य छन्दःसमीक्षा में प्रतिपादित छन्दोगणितीय अध्याय का विस्तार से विश्लेषण करना है (ओझा, 1991)। संस्कृत छन्दःशास्त्र का एक प्रमुख अङ्ग प्रत्यय है। छन्दःसूत्र में समवृत्त, अर्धसमवृत्त तथा विषमवृत्त आदि आवश्यक वृत्तों को बताया गया है लेकिन अनेक छन्दःशास्त्र के विद्वानों ने इनके अतिरिक्त भी छन्दों को स्वीकार किया है। उन अतिरिक्त छन्दों के ज्ञान के लिए प्रत्ययों का वर्णन किया गया है (शर्मा, 1909)। इसी आधार पर छन्दों से युक्त ग्रन्थों के रचयिता तथा शास्त्रों में निपुण आचार्यों ने अपनी कृतियों में प्रत्ययों का वर्णन किया है।
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Pages:275-278
How to cite this article:
रवि कुमार मीना "छन्द : समीक्षा में प्रतिपादित छन्दोगणित की प्रासंगिकता". International Journal of Advanced Research and Development, Vol 2, Issue 3, 2017, Pages 275-278
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